मिथिला लोक मुर्ति कलाक सौन्दर्य - सामा - चकेवा : एससी सुमन

 मिथिला लोक मुर्ति कलाक सौन्दर्य - सामा - चकेवा : एससी सुमन


१. Introduction (परिचय) :

आजुक आधुनिक युग मे तेजी सँ विकासक पश्चात् पौराणिक कथा आ लोककथा पर आधारित परम्परा एखनो विभिन्न समुदाय आ क्षेत्र मे कायम छैक । यैह कारण अछि जे द्वापर युग सँ चलि रहल सामा-चकेवा पावनि मिथिलांचल मे नहि आर्यवर्तक अन्य क्षेत्र मे सेहो उल्लास आ लोकाचार सँ मनाओल जाइत अछि |  आर्यवर्त के मिथिला, मगध, बैशाली आ पटलीपुत्र आदि राज्य अर्थात नेपाल के तराई-मधेश, बिहार, झारखंड आ उत्तर प्रदेश के किछु भाग में मनाओल जाइत छैक  | नेपाल मे मनाओल जायवला विभिन्न धार्मिक आ आध्यात्मिक सांस्कृतिक उत्सव मे सर्वाधिक लोकप्रिय पावनि अछि ‘सामा-चकेवा’ । एहि मे विवाहित आ अविवाहित दुनू बहिन अपन भाय के दीर्घायु के कामना करैत सामा के भूमिका निभाबैत छथि जे भाई-बहिन के बीच अपार प्रेम आ असीम स्नेह स भरल सामा पर्व में निम्नलिखित धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ कलात्मक विशेषता अछि |


उगैत सूर्य के अर्घ चढ़ा क लोक पर्व ‘छैठ’ मनाओल जाईत छैत | एकर संगहि शरद ऋतुक आगमनक बाद हिमालय पर जखन ठंढा भ' जाइत छैक त' रंग-बिरंगक प्रवासी चिड़ै सभ मिथिलान्चल दिस विदा भ' जाइत छैक, जकर चर्चा लोकपर्व सामा-चकेवा मे सेहो भेटैत अछि | ई सब सामा आ चकेवा लोक पर्व सामा - चकेवा क प्रतिनिधि पात्र छथि । एकरा ( कार्तिक ) महीना में बेसीतर नवम्बर में मनाओल जाइत छैक | भले ही ई सामा बहिनऽ द्वारा अपनऽ भाई के दीर्घायु आ समृद्धिके कामना करै लेली मनाबै वाला पर्व छै, लेकिन एकरा सामा 'खेलब' कहलऽ जाय छै जाहिमे मृणशिल्प आर लोकगीत गायन के विशेष सभा होयत छैक । 


२.Historical Background ( एतिहासिक पृष्ठभुमि ) : 

खास क नेपालके पूर्वी आ मध्य तराई में छठ पाबैन सँ एक दिन पहिने आ अन्यत्र छठ पाबैनके बादक दिन सँ मनाओल जाय वाला एहि पावनि के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्पष्ट नै छैक | एहि पाबैनके संबंधमें सांस्कृतिक विशेषज्ञके बीच सेहो मतभेद देखल जाइत अछि | पद्म पुराण, स्कन्द पुराण आ संबपुराण सन विभिन्न पुराण मे एहि पाबैनके बारे मे चर्चा कयल गेल छैक ।


 ‘सामा-चकेवा’ लोक उत्सव द्वापर युगमे भगवान श्रीकृष्णक समय सँ शुरू भेल छल | ई पावनि भगवान श्रीकृष्णक पुत्री साम्बा आ पुत्र साम्बक कथा पर आधारित अछि | एहि कथाक अनुसार भगवान् श्रीकृष्णक पत्नी जाम्बवतीक एगारह टा संतान भेलनि जाहि मे दस टा बेटा आ एकटा बेटी सेहो छल | ओहि मे जेठका बेटाक नाम साम्ब आ बेटीक नाम साम्बा यानी श्यामा वा सामा रहैक । बेटी श्यामा आ बेटा साम्बके दुनु भाय बहिनक बीच असीम स्नेह छल । सामा  सुन्नैर आ चरित्रवान छलीह,  हुनकर सौन्दर्यक प्रशंसा सर्वत्र होइत छलनि । साम्बक सौन्दर्य सँ मोहित ‘चुडक’ भगवान् श्रीकृष्णक पुरी द्वारिका मे निवासी आकर्षित भेल  | राज्यक सामंत चूड़क सेहो श्यामा सँ प्रेम करैत छथि । चूड़क  एकटा दुष्ट प्रवृतिक मनुष्य छ्ल  । पुत्री श्यामा जवान भेलाक बाद, ओतय श्यामाक विवाह ‘चारूवक’ नामक युवक सँ गंधर्व पद्धति सँ पूरा होइत छैक  । 


तकर बाद श्यामा सानन्द अपन पतिक घर मे रहय लगैत छथि । श्यामाके नै पाबि प्रेमान्ध चूड़क भगवान श्रीकृष्णक दरबार जाइ छै आ अपन बेटी श्यामाक चरित्र पर चर्चा करए लगैत छै। वृन्दावन के दिव्य वन के बीचोबीच गोपेश्वर महादेव के मंदिर छेलै । वैवाहिक जीवन मे उतार-चढ़ाव नहि आ दीर्घ सुख भेटबाक उद्देश्य सँ ओ अपन पति चारूवक केर आदेश ग्रहण करैत सखी दिहुलीक सङ्ग नियमित रूप सँ उक्त मंदिर मे जा क' हुनकर पूजा आ ऋषिलोकनिक सेवा करबाक लेल जाईत छलि ।


 एहि प्रसंगके जोडि चूडक भगवान श्रीकृष्णके सामाके चरित्र पर असत्य नै घटलै  घटना सुनाबै छैक । कथा सुनि बिना सत्य के उजागर केने श्री कृष्ण अपन बेटी साम्बा के चिड़ै बनबाक लेल श्राप दैत छथि | ओहि दिन सँ सामा चिड़ै के योनि मे प्रवेश क' जंगल मे भटकय लगैत अछि । जखन चकेवा के ई बात जनतब होइत छैन त ओकरा सामा के प्रेम के प्रति व्याकुल भय जाय छैन । सामा सँ भेंट करबाक लेल कठोर तपस्याक अपनहु चिडैके योनि प्राप्त क सामा - चकेवा चिडै के रुपमे सुखी पुर्वक जंगल मे रहलागल । 


एहि घटनाक समय श्रीकृष्णक पुत्र साम्ब जे राजकीय यात्रा पर गेलछलाह । राजधानी वापस अबैत, ई सब बात सुनि पिता स निहोरा करैत अछि जे अपन बहिन सामा के एतेक कठोर सजा नै दियौक, मुदा ई देखि जे ओकर कोनो कसुर ​​नै छै । पिताके नहि मानला पर,  साम्ब वादा करै छै जे जाबे तक बहिन सामा के न्याय नै भेटतै ता धरी  ओ घर नै वापस घुरी नहि आओत । आ अपन बहिनके श्यामा आ चारुबक्य बनेबाक लेल तपस्या करबाक लेल बृन्दावन चलि गेलाह । भाय साम्बके तपस्या सँ प्रसन्न भ' भगवान् श्रीकृष्ण सामा केँ शाप सँ मुक्त करैत छथि । 


एहि तरहें अपन भायक अथक प्रयास आ साधना केर प्रभाव सँ बहिन सामा फेर सँ मानव योनि मे घुरि जाइत छैथ । तकर बाद जखन सामा अपन प्रेमी चकेबा के संग वृंदावन जाइत छथि, जिनका ओ फेर स पति के रूप में स्वीकार क लेलैथ । श्यामा के चरी बनय के श्राप भेटला के बाद चूड़क चुडक के नाम बदलि क चुगला राखी क देलखिन्ह ।  चुगला सब गोटेके देल गारी सं क्रोधित भय वृंदावनमे आगि लगा देलक ।  जहिना आगि लगायल गेल,  तहिना वृन्दावन मे भयंकर अन्हर - बिहारी सँग बरखा होबय लगैत अछि । अन्हर - बिहारीके कारण गाछ खसला पर चूड़क कुचलल जाइत छैक । जरैत वृन्दावनकेँ आगि भाय साम्ब मिझाबैत अछि आ चुगिलाके पकैडक सामा लग लय अवैत अछि । दुष्ट चुगिलाके गारी, बेइज्जती कय मुह आ मोछ झरकालोल जाईत छैक । तत पश्चात सामा सँग चकेबाक कय सामाके सासुर विदाइ कयल जाईत छैक ।


भाय साम्बके भगवान श्रीकृष्ण कहलखिन कार्तिक शुक्ल पंचमी स कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक 11 दिन तक गोपेश्वर महादेव मंदिर परिसर में गायन आ नृत्य क भगवान भोलेनाथ के प्रसन्न कयल जाय। ततपश्चत प्रसन्न भ' स्त्रीगण सामा चकेवा, अहाँ आ चूड़क, वृन्दावन आ सप्तर्षिक मूर्ति बना, ओकरा अनेक रंग सँ रंगि, बाँसक चगेरा मे धूप राखि, दही चढ़ा क' ई मूर्ति सभ माथ पर राखि चारू कात घुमैत छथि पूरा गाम गीत गाबैत, ई प्रक्रिया पूर्णिमा तक चलैत रहै, पूर्णिमा के दिन सब गोटे भाई बहिन के विभिन्न तरहक मिठाई आ व्यंजन स तृप्त केलाक बाद चूड़क जराबय के परंपरा बनाबी ताहीसँ सब भाय वहिनके कल्याण  होयत । अहि तरहे सामा - चकेवा पर्व भाय बहिनक प्रेम प्रतीकक रुपमे स्थापित भेल ।


३. Cultural characteristics ( सांस्कृतिक परम्परा आ विधान ) : 


आइयो मिथिलांचलक गाम-गाम मे महिला ‘सामा-चकेबा’ खेलाइत छैथि । एहि पावनि मे साम्बा (सामा), चकेवा (चरुवाक) के अतिरिक्त एहि कथा सँ जुड़ल पात्र साम्ब, सतभैया, चुगला (चुडक), वृन्दावन, चौकीदार, झांझी कुकुर आदि । भाय-बहिन के बीच अंतरंग प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाओल जाय वाला बहिन सब अपन भाय के एहि पावनि में नीक स्वास्थ्य आ दीर्घायु के कामना करैत छथि |


सामा आ चकेवा एहि महोत्सवक दूटा मुख्य पात्र छथि, सामा स्त्री पात्र छथि जखन कि चकेवा पुरुष पात्र छथि । तहिना एकटा आओर पात्र ‘चुगला’ अछि जे समाजक खलपत्रक प्रतीकक रूप मे चुगली करैत अछि । विभिन्न पात्रक प्रतीकक रूप मे बनल माटिक मूर्ति केँ कात्तिक शुक्ल पंचमीक साँझ सँ बाँसक चगेरा मे राखल जाइत अछि, गामक बाहर खुल्ला स्थान पर गामक बहिन-भाई लोकनि एक ठाम आबि सामा-चकेवा सँ जुड़ल गीत गबैत छथि आ सामा खेलाल करैत छथि | एहि क्रम मे महिला समूह मे डाला मे मूर्ति सजबैत कार्तिक के शुक्लपक्ष पंचमी के साँझ स शुरू भ गामक  चौक, चौराहा आदि मे जमा भ लोकगीत गाबि नृत्य करैत छथि |


"सामा खेले चलली सखी सँग सहेली हो.., साम चके साम चके अइहो हे जोतला खेत में बैसिहो है.., चुगला करे चुगलपन बिलैया करे म्याउँऊं,".... 



 ई पावनि द्वितिया तिथि सँ शुरू भेल मानल जा सकैत अछि द्वितीया तिथि पर महिला सब भोरे-भोर समूह मे जमा भ' जाइत छथि आ गोवर्धन  पूजा करैत छथि | आ  बजरी ( केराउक दाना) राखि गोधन पीसैत छथि आ भाई केँ खुआबय लेल बजरी संग्रह करैत छैथ, संगे सामा आ छठि गीत गबैत छथि, बाँसक चगेरा आ खुरपि ल' क' पवित्र स्थान सँ माटि ल' क' घर घुरि अबैइत छथि ।


एहि मूर्ति सभक लेल माटि, बाँसक बत्ती, सनपाट (जूट), जौ, कौडी, सिक्की, करजनी (एक प्रकारक आधा लाल आधा कारी बियाँ ) खर, आ विभिन्न प्रकारक रंग, पिहुआ ( ब्रस) केर आवश्यकता होइत अछि, विभिन्न नामक पात्रक प्रतीकात्मक मूर्ति  जेना - सामा, चकेबा, वृन्दावन, चुगीला, सतभैया, चकेबा, वृन्दावन, चुगिला, सतभैया,बटतकनी, मयुर, वनतितिर, खरलुच्ची, झाँझी कुकुर, मलिनीया, ढोलकीया, बजनीयाँ लड्डु बेचनी, कहरीया, भरीया, चुगिलाक पत्नी आदि। | भले ही खरना के दिन सब मूर्ति बनेनाई संभव नै छै, लेकिन सामा, चकेबा, वृंदावन आरू चुगीला बनेनाई अनिवार्य होईत छैक । क्रमिक रुपसँ प्रत्येक  दिन मुर्ति बनेबाक क्रम जारी रहैइत छैक ।


एगारह दिन धरि उत्सव मनबैत काल सब मूर्ति आ संबंधित सामग्री जेना घरक सामान, घैल, पौति-पेटरी आदि माटि सँ बनओल जाईत छैक । जे पाबनि मे विवाहित लड़की सब प्रायः नैइहर मे आबि खेलाइत अछि | खुला आँगन, कोठी, चौक आ आँगन मे खरपतवार के घर के भीतर राखब वर्जित अछि चूँकि खरपतवार के देवता मानल जाइत अछि, ताहि लेल ओकरा आँगन के पवित्र स्थान मे राखल जाइत अछि |


भोजन के बाद बहिन-भाई सब घर स बाहर निकलैत छथि गीत गबैत चूँकि बिना गीत के सामा खेलब असंभव अछि । सब गोटे  एक ठाम जमा भ' क' कतेको मौलिक गीत गबैत छथि खेल के अंत में बहिन सब गोल-गोल वृत्ताकार में बैसि गीत गाबैत अपन डाला घुमाबैत छथि, जकरा डलाफेर कहल जाइत छैक । जे भाई-बहिन के स्वास्थ्य, धन आ कदर के संग मिश्रित अछि ।


सामा के बेटी के रूप में देखल जाइत अछि ताहि लेल विसर्जन सँ पांच दिन पहिने विदाई गीत 'समदाओन' गाओल जाइत अछि । विसर्जनक दिन अंगनामे ठा - पिढी अरिपन दअ दहि चुरा (नवान्न) सक्करक भोग लगाओल जाईत छैक । जेकरा सामाके प्रसादक रुपमे ग्रहण कयल जाइत छैक । दिदी बहिन भायके गमछामे पाँच मुट्ठी चुरा आ भूसबा दैछ्थिन, जकरा फाँर भरब  कहल जाइत छैक | भायके अरिपन देल पिढी पर बैसा मुख्य मुर्ति सामाके खोईछ भरल जाईत छैक आ  मुख्य मुर्ति  सामा बाहेक अन्य सब मूर्तिके  ठेहुन पर राखि भाय द्वारा फोडाओल जाईत छैक । 


ताहि कारणेँ भाइ सब अपन बहिन सबके बेसी सँ बेसी यथासाक्य कपड़ा, गर- गहना आ नगद उपहार मे दैत छथि आ बहिन लोकनि गोवर्धन पूजाक दिन संग्रहित बजरी अपन हाथ सँ खुआबैत छथि, आ आशीर्वाद दैत छथि | आशयजे  शरीर बज्र होय आ स्वस्थ रहबाक आशिर्वाद दैत छथिन । काज के समाप्त भेला पर सम्पूर्ण सामाकृतिके के सजल डाला में राखि भसान के लेल ल जाइत अछि |


 पूर्णिमा के उज्ज्वल राति में भाइ सब आगू-पाछू चलैत रहैत छथि जेना जमात रक्षाक आ बहिन सब समूह के बीच में बाजा गाजा के संग जोरदार आवाज में वियोगंत आ बटगमानी गीत गबैत रहैत छथि । अहि साल भसानक  मुहूर्त (कैलेंडर ) ई तय निर्धारित करैत अछि जे एहि साल भासना कोन दिशा मे होयत । ओहि दिशा मे जा कए जतय भसान करबाक अछि, ओत ठामक चारू कात चारि टा मशाल जरा दैत छथि । जोतेल खेत, खरिहान वा नदिक किनारमे भसान कय  हे सामा! अगिला साल फेर अविह हे के कामना सहित सब ललाना उदास मोन सँ अपन घर घुरैत अबैत छथि ।


४. Social characteristics (सामाजिक विशेषता ) : 

 सामा के सब पात्र सामाजिक परिवेश में समाहित अछि, गीत गबैत काल सामा के बहिन या बेटी के रूप में,  भाय के रूप में आ चुगीला खलपात्र के रूप में देखबाक परंपरा अछि ।  ई संदेश देबय के कोशिश अछि जे भाई अपन बहिन के विपत्ति स बचाबय लेल किछुओ करय लेल तैयार छथि जखन कि भाई के बहादुरी, उदारता आ अपन बहिन के प्रति निस्वार्थ प्रेम देखाओल गेल अछि । संकीर्ण भावना बदलल गेल अछि आ स्वतंत्रता देबय दिस उन्मुख भ गेल अछि सामाजिक प्रतिबंध कारण महिला के अपन विचार स्वतंत्र रूप सं व्यक्त करय के अनुमति नहिं अछि, आ महिला के अपन जीवनक बारे में निर्णय लेबय के अनुमति नहिं अछि । महिला हिंसाके  प्रतिकार कयल गेलछैक । समाज मे नीक विचारक लोकक सम्मान आ प्रशंसा होइत छैक आ अधलाह विचारक लोकक अपमान आ घृणा होइत छैक ।


चूँकि सामा के बेटी के रूप में देखल जाइत अछि, ताहि लेल गीत में बहुत सौम्य आ सम्मानजनक शब्दक्न्प्रयोग होईत छैक। एगारह दिन तक अखण्ड रुपमे लगातार प्रत्येक राईत सामा खेलल जाईत छैक । एक दिन छुटलके अर्थ सामा उपवास भेल मानल जाइत छैक । तसर्थ  प्रत्येक दिन सामा खेललाक वाद मुर्ति सबके धान आ शीतको बुन्द खुयाल जाइत छैक  | 


सामा विदाइ होइत काल बेटिके विदाइमे  सासुर जाईत काल नैहर स देबबाला आवश्यक घरायसी सामग्री देल जाइत छनि, पलंग, तकिया, बिछाओन, कपड़ा, गहना, भनसा घर मे प्रयुक्त सब बर्तन - वासन, दराज, बक्सा, पौती - पेटारी आदि सब बस्तु माईटके बना ओहिमे खद्यान वस्तु चाउर, दाल, चिकस, चुरा, विभिन्न प्रकारक अन्न आ तरकारी के संग देल जाइत अछि ।  सामा चकेबा एकटा खेल अछि | एकटा पैघ सामाजिक परिवेश अछि एहि मे भाइ-बहिन,  पति, पत्नी, देवर, मित्र, भरिया कहरिया, ढोलिया, बजनियाँ, मलिनियाँ, लड्डू बेचनिहार आदि पात्र अछि । जे सामाजिक एकता आ कर्म प्रधानताक प्रतीक अछी । 


५.  Art specialty (कला विशेषता)  : 

सामा चकेबा में कला पक्ष के अद्भुत आ अद्वितीय संयोजन अछि | ई मौलिक लोक कला पर आधारित छैक ।  एकरा में हस्तशिल्प, मूर्तिकला आ गायन के समागम (उपस्थिति) छै । सामा गीतक लय आ राग अद्वितीय अछि ई गीत मात्र सामा पर्व मे बिना अन्य समय मे गाओल जाइत अछि एहि मे प्रयुक्त सभटा कला सामग्री स्वाभाविक आ सस्ता अछि, जे आसपासक परिवेश सँ सहजता सँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि | माटि सँ बनल आत्मा नहि होइत छैक मूर्तिक गरदनि मे पिढी बना कऽ चेहरा बनाओल जाइत छैक आँखि, नाक, मुँह आ कानक आकार अद्वितीय होइत छैक | मूर्ति सब पर सेहो मुकुट के सजाबय लेल जौ के दानाक प्रयोग मे ल्याल जाईत छैक  |


मुख्य मूर्ति के केश सन - पाट ( जूट ) के होइत अछि, मुँह, ठोर, कौडीके, आँखि बनेबाक लेल करजनी प्रयोग के होइत छैक ।  अछि चूँकि सब मूर्ति एकहि समान होइत अछि, ताहि लेल पुरुष पात्र के मोंछ आ पाग बनाओल जाइत अछि जाहि स लिंग के भेद कयल जा सकै | भाय प्रतीक भेल मुर्तिसब के माईटक छाता बना ओढाओल जाईत छैक । वृन्दावन एक प्रकारक जङ्गल छैक मुदा एकरा मानवीयकरण कयल गेल छैक एकर माथ मे एक मुठ्ठी सिक्की (एक तरहक घास) घुसाओल जाइत छैक । स्मरणीय बात ई जे सामके अधिकांश पात्र चिड़ै-चुनमुनीक रूप मे होइत अछि । यद्यपि एकर आकार गाम, स्थान, जाति आ व्यक्तिक आधार पर भिन्न-भिनन्न भय सकैत  अछि । काँच मूर्तिलाई के रौद मे सुखा  पिठार के उपयोग कय ढेउरल जाइत छैइक । ई प्रारम्भिक  रंग होइत छैक । ताही उपर विभिन्न  रंगक प्रयोग कयल जाइत छैक। पहिले मुर्ति  के रगके लेल प्राकृति  रंगक प्रयोग होइत छलैक लाल रंग के लेल प्रायः गेउर रंग (एक प्रकार के माटि) के प्रयोग होइत छलैक । मुदा आबक समय मे विभिन्न प्रकारक बजार मे भेट बाला रंग सबसँ होईत छैक  | सुनहला( गोल्डेन ) रंग सबके प्रयोगसँ  मुर्ति  सब विशेष  आकर्षक  भय जाईत छैक । ई सब मूर्ति डोम समुदाय द्वारा बाँस सँ बनल हाथ सँ बनल चँगेरा (डाला) मे राखल जाइत अछि |जे विभिन्न  रंगसँ रंगल रहैत छैक । 


 ६. New Generation Art Training Admission Traditions (नव पुस्ताके कला प्रशिक्षण प्रवेशिका परम्परा) : 

एतय नव पीढी के पहिने वसंत पंचमी अर्थात सरस्वती पूजा के दिन स वर्णमाला ज्ञान स परिचय कराओल जाइत अछि, जखन कि चित्रकला शिक्षा के ज्ञान तुसारी पूजा स शुरू होइत अछि अर्थात | एहि तरहें सामा-चकेवा पावनि सँ मूर्तिकला आ गायनक ज्ञान देब शुरू भ' जाइत अछि । एहि तरहें नव पीढ़ी अपन पुरान पीढ़ी सँ कलाक शिल्प आ सौन्दर्य सीखैत अछि । तेँ मिथिला कला आ संस्कृतिक समृद्ध भूमि थिक ।


७. Methodology (विधि) :

मिथिलाक समस्त कलामे मृण्मूर्ती कला सबसँ प्राचीन  बुझना जाईत अछी जकर अभ्यास मिथिलामे अति छिन कालसँ होइत आयाल अछी । अशिक्षित  सामान्य जनक ई कला मिथिलाक सामाजिक  जीवनक विभिन्न पक्ष पर प्रचुर प्रकाश  दैइत अछी । माटिक- मूर्ति  अति प्राचीन गौरवशाली परम्पराक जीवन्त कथा थिक जे विभिन्न रुपमे अद्यावधि जीवित अछी ।  तत्कालिन धार्मिक मान्यता , मनोरंजन , वस्त्र तथा आभूषणक अध्ययनक हेतु मृण्मूर्ती बहुमुल्य सामग्री  प्रस्तुत करैत अछी । मिथिलामे महत्त्वपूर्ण  मृण्मूर्ति होइत अछि सामा- चकेवाक - जाहिमे  करिब - करिब पचास गोट मूर्तिक निर्माण  कयल जाइत अछी जकर सम्बन्ध कार्तिक मासमे भगवान श्रीकृष्णक बहिन श्यामाक जीवनसँ सम्बन्धित  विभिन्न  घटनासँ रहैत छैक । जेकर चर्चा कय चुकल छी । एकर अतिरिक्त, बोरिस, मट्कूड, चूल्हा, कोठी, मोरहा, ढेकुली आदि वस्तुक निर्माण सेहो माटिएसँ कयल जाइत अछी । यद्यपि एहि वस्तु सभके कलाकार  रंगसँ चित्रित  नहि  करैत  छथि , तथापि  एकरा जाही तरहें आकर्षक  बनेबाक प्रयास  कयल जाय्त अछी, सर्वथा प्रसंशनीय । 


नवरात्रा ( दुर्गापूजा) तथा अन्य धार्मिक  पर्व - समारोहक अवसर पर दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, राधाकृष्ण एवं  अन्य देवी - देवताक मूर्तिक निर्माण  - परम्पराकेँ पूर्णरूपेण जीवित राखयमे ग्रामिण कुम्हारक महत्वपूर्ण  भूमिका  रह्स्ल अछी । कोनो दृष्टिएँ विचार  कयल पर ई सपस्ट भय जायत जे एहि जीवन्त, स्फूर्त तथा आकर्षक मूर्तिसभ मिथिलाक लोक - कलामे गौरवपूर्ण स्था! अछी । * ( विशेष वर्णनक हेतु द्रष्ट्व्य, ' स्ट्डीज इन ईडियन फोककल्चर, पृ० १०२ - ०३)

एकर मूर्तिक विसर्जन खेल नाच कए होइत अछि । सामा चकेवा के मूर्ति कोनो नदी या पोखरि में सं मिथिलाक गीतमय वातावरण में विसर्जन कायल जाइत अछि | एहि मे लोक मूर्तिक विभिन्न पात्रक निर्माण एहि तरहेँ कयल गेल अछि (राकेश, पृष्ठ १५०-१५२) ।

८. Sama - chakewa characters and sketchs ( समा - चकेवाक पात्र आ रेखाचित्र ) : 

• समाचकेवा (पति-पत्नी) के आदर्श दंपति के रूप में सम्मानित कयल जाइत अछि | ओहि मे एकटा सुन्दर जोड़ी चिड़ै बनैत अछि ।

• साम्ब (सामाक भाइ) केँ सेहो आदर्श पात्रक रूप मे चित्रित कयल गेल अछि | भाइ साम्ब अपन पितासँ प्रार्थना केलनि जे चिड़ै बनि गेल अपन बहिन आ जमायकेँ मनुक्खक रूपमे वापस करथि । एहि तरहेँ जे बहिन शापित भ' चिड़ै बनि गेलीह ओ शाप सँ मुक्त भ' गेलीह ।

• चुगला : चुगलाकेँ तिरस्कृत पात्रक रूपमे चित्रित कएल गेल अछि। चुगलासँ ककरो सहानुभूति नहि होइत छैक । कारण समाज मे हुनका झगड़ा करयवला पात्रक रूप मे वर्णित कयल गेल अछि । एकर मूर्ति बनेबा मे जुगा जूट आ मूंगफली के प्रयोग होइत अछि | जेना एकरा सजा देबाक प्रथा अछि तहिना ओकर दाढ़ी मे आगि लगेबाक प्रथा अछि । माथक ऊपर दीप जराओल जाइत अछि। एहि तरहें घृणित व्यक्तिक उपहास कयल जाइत अछि ।

• सतभैया : सतभैया अर्थात् सात भाई। सामाक एकटा भाइ साम्ब छल। एहि मे सतभाईक कल्पना कयल गेल अछि। सात भाइ के रूप आ गुण के विस्तार स वर्णन एहि लोक नृत्य में गीत के माध्यम स कयल गेल अछि | एकटा बहिनक हृदय मे अपन भाइक प्रति गहींर प्रेम अछि। बहिन केरऽ स्वाभाविक प्रवृत्ति छै कि वू बहुत भाई-बहिन केरऽ कामना करै छै अतः सात भाई-बहिन केरऽ अवधारणा छै कयल गेल अछि

• खंजन : खंजन चिड़ै शरद ऋतुक हस्त नक्षत्र मे पहाड़ सँ उतरि तराईक श्यामल क्षेत्र मे अबैत अछि | एकरा शरद ऋतुक प्रतीक आ चिड़ै-चुनमुनीक मित्र बुझल जाइत अछि ।

• तीतर : ई चिड़ै खास क’ जंगलक घनगर झाड़ी मे रहैत अछि । जंगल मे खरपतवार सँ भेंट होइत छैक। ई अपनऽ सुंदरता, चंचलता आरू नृत्य के लेलऽ विशेष रूप स॑ प्रसिद्ध चिड़िया छेकै । सामा चकेवा के लोक नृत्य में एकरा श्यामा के सखी के रूप में वर्णित करलऽ गेलऽ छै ।

• झांझी कुकुर : मैथिली लोककथा मे एकर वर्णन महलक आभूषणक रूप मे कयल गेल अछि | कुकुर बहुत आज्ञाकारी, भक्त आ रक्षात्मक होइत अछि, तेँ सामाक मित्रक रूप मे भेटैत अछि ।

• वृन्दावन : वृन्दावन वन के रूप में प्रसिद्ध अछि, मुदा लोक नृत्य में एकर आकृति पुरुष के रूप में होइत अछि | एहि जंगल मे घास चरैत छल, तेँ जंगलक मूर्तिक आकृति मनुक्खक रूप मे बनैत अछि | एकर नोक मे आगि लगा देल गेल अछि।

• चाँचर : चंचर शब्दक अर्थ परती भूमि होइत छैक । एहि गीत के चाँचर लोकगीत कहल जाइत अछि, जे जमीन के जोतला पर धान रोपबाक लेल तैयार कयल जाइत अछि (राकेश, पृष्ठ 122-123) ।

सन्दर्भ : राकेश, डॉ. राम दयाल। 2056 के। मैथिली संस्कृति। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान।



९. Results and discussion (परिणाम आर चर्चा) : 

समय के संग बदलाब संगआजुक बदलैत समयमे आधुनिकता के कोनो प्रभाव सँ प्रभावित पारम्परिक सामा - चकेबा भेलजा रहल छैक । पहिने महिला माटिक सामग्री – सामा - चकेवा प्रत्येक दिन अपन हाथ स बनबैत छलीह । एकरा अलग-अलग रंग सँ सजाबैत छलीह। मुदा आब अहि क्रम मे बदलाब आबि रहल छैक । कियाकत आब रंग-बिरंगक रेडीमेड माटि सँ बनल सामा - चकेवाक  मूर्ति सब बाजार मे सेहो क्रमिक रुपसँ  उपलब्ध होइत आयल छैक । स्त्रीगण ई कीनि कऽ घर मे अनैत छथि । मुदा आब मिथिलाक एहि संस्कृति, एहन लोकगीत, एहन लोक नृत्य, लोकक आधुनिक जीवनशैली, एकल परिवार बढ़ला सँ आ रोजगारक कारणे लोक दोसर लोक पर निर्भर भ' रहल अछि, एक तरहेँ हानि भ' रहल अछि । 

 एकरा गीत आ मूर्ति कला के कौशल सीखय के लेल प्रशिक्षण के आवश्यकता नै छै एकरा एक पीढ़ी स अगिला पीढ़ी में सहजता स पहुंचा देल जाइत छै ।


१०. Training requirements (प्रशिक्षणक आवश्यकता) :

(क) समा - चकेवा विशेष रूप स मिथिला क्षेत्र मे एकटा महत्वपूर्ण पावनि अछि, कियाक त इ लोककथा आ लोक जीवन पर आधारित परंपरा अछि, इ कार्यक्रम एकर प्रचार-प्रसार आ विकास लेल महत्वपूर्ण होयत।

(ख) एहि क्षेत्र मे समा- चकेवा पर्व सँ जुड़ल कला निर्माणक पक्ष केँ आगू बढ़ाबए आ एहि क्षेत्र मे काज करयवला कलाकारक जीवन स्तर केँ बढ़ेबाक संग-संग एकर प्रचार-प्रसार करब ।

(ग) कोनो समयमे मिथिला  चित्रकला अंगना आ घरक  भीत पर रहैइक, कलालारक विभिन्न  तरहक कठिन  प्रयासक बाद आई व्यापक बिस्तार भेलै आ आर विस्तारक क्रममे छैक । जाहिमे प्रशिक्षणक एकटा प्रमुख कारण रहल छैक । 

(घ) मुर्तिकलाक प्रशिक्षण सँ  मिथिलाक हस्तकला व्यापक विस्तार होयत से विश्वास कयल जा सकैया । इ प्रशिक्षणक बाद अगिला चरण "सेरामिक" प्रशिक्षणके होय, जाहिसँ अन्तर्राष्ट्रिय सेरामिक कला तथा कला वजारमे पहिचान देत से कहि सकैत छी । 

( ङ) राजर्षि जनक विश्वविद्यालयमे ब्याचलर ईन मिथिला आर्ट के बिभाग संचालन करब आ पाठ्यक्रम  निर्माणमे सेहो मीलके पाथर साबित  होयत  ।


११. Conclusion (निष्कर्ष) :

आइ जखन हम सामा - चकेवाक इतिहास जानबाक लेल किछु पुरान साहित्य आ किंवदंती मे खोदबाक प्रयास करैत छी तऽ हमरा जे जानकारी भेटैत अछि ताहि सँ कतेको विरोधाभासी पक्ष उजागर होइत अछि । किछु ठाम सामा आ चकेवा के जोड़ी के भाई-बहिन के रूप में आ किछु ठाम पति-पत्नी के रूप में प्रस्तुत कयल गेल अछि | असल मे ई शरद ऋतुक गीत-नाटक अछि जकर माध्यमे मिथिलांचलक सब उमेरक लोकक मनोरंजन भेल । एहि गीतिनाटक विशेषता ई जे एहि मे जे पात्र अछि ओ जीवित पात्र नहि अपितु माटिक मूर्ति थिक । ताहि माध्यमे लड़कियो सब स्वयं सुगमकर्ताक काज करैत छथि आ मूर्ति सब केँ कथाक अनुसार व्यवहार करबैत छथि । एकर कथा बहुत प्राचीन अछि आ कहल जाइत अछि जे एकर चर्चा पद्मपुराण आ स्कन्धपुराण मे भेल अछि | मूल कथा पर मतभेद अछि। विभिन्न पुराण तथा लोक  कथाक अनुसार कथासार सामा अर्थात् श्यामा श्री कृष्णक पुत्री छलीह आ चकेवा अर्थात् चारूवक्र हुनक पति छलाह | एकटा दुष्ट व्यक्ति श्री कृष्ण आ हुनक पति के गपशप केलक जे श्यामा के कोनो ऋषि के प्रेम अछि | श्री कृष्ण क्रोधित भ श्यामा के शपथ देलखिन जे चिड़ै बनि वृन्दावन में भटकब सा अन्तत: भाय के अनुरोध पर श्राप सँ मुक्ति । 

प्रस्तुत समा चकेवा मूर्तिकला प्रशिक्षण आ समा चकेवा कला निर्माण संगोष्ठी, आ प्रस्तुति आ टीका कार्यक्रम एक दिस नेपालक मौलिक सांस्कृतिक वैभव के संरक्षण एवम्   व्यावसायिक  प्रवर्धन के रूप मे समा - चकेवा सांस्कृतिक महोत्सव के महत्व के उजागर करैत अछि आ दोसर दिस समा - चकेवा महोत्सव स जुड़ल मूर्ति निर्माण कार्य में मदद करैत अछि | पीढ़ी दर पीढ़ी के लेल एकटा व्यवस्थित बिधिके प्रचार-प्रसार होयत। समाचक के प्रचार-प्रसार के अलावा व्यवस्थित तरीका स मूर्ति निर्माण मे मदद सँ समा चकेवा के कला निर्माण के रक्षा, समृद्ध, प्रचार आ प्रचार प्रसार होयत। एकरऽ परिणाम ई छै कि प्रांत म॑ ललित कला गतिविधि म॑ समा चकेवा लोक कला के प्रचार आरू प्रचार बढ़ी जैतै । कला पर्यटन के विकास होयत। कला समय के साथ अर्थव्यवस्था में सकारात्मक योगदान द सकैत अछि ।

१२. References (सन्दर्भ सामग्री सूची)

* राकेश, डॉ. राम दयाल। 2056 के। मैथिली संस्कृति। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान । (राकेश, पृष्ठ 122-123) ।

* डा. उपेन्द्र ठाकुर , मिथिलाक चित्रकला ओ शिल्पकला । 

* विशेष वर्णनक हेतु द्रष्ट्व्य, ' स्ट्डीज इन ईडियन फोककल्चर, पृ० १०२ - ०३ । 

* कृष्ण कुमार कश्यप । श्रीमती शशिबाला,  मिथिला लोक चित्रकला । 

( मिथिला लोक मुर्ति कलाक सौन्दर्य - सामा - चकेवा : एससी सुमन

नेपाल ललित कला प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ मैथिली  विकास कोषक  सहायोजनमा, जनकपुरधाममे मैथिली  विकास कोषक भवन जनकपुर मे सामा - चकेवा कला कार्यशालाके अन्तर्गत प्रस्तुत भेल/ दिनाक: / जाहिमे नित्यानन्द मण्डल टिप्पणीकेने छ्लाह ।  )

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